समय के साथ जब जीवन हमें आईना दिखाता है, तब कई सच्चाइयाँ खुद-ब-खुद स्पष्ट होने लगती हैं। यह समझ धीरे-धीरे गहराती है और जीवन को देखने का नजरिया अधिक शांत, सरल और संवेदनशील होता चला जाता है।यह परिवर्तन अचानक नहीं है, बल्कि वर्षों से भीतर पल रहे शांति और दयाभाव की स्वाभाविक परिणति है। समय ने बस उसे और स्पष्ट कर दिया है।
जीवन की अनिश्चितताओं को स्वीकार करना सीख लिया है, इसलिए मन अब घटनाओं के साथ अधिक सहज और संतुलित रहता है। यह भी समझ में आया है कि हर व्यक्ति की अपनी यात्रा और अपनी जिम्मेदारियाँ होती हैं, इसलिए अनावश्यक चिंता मन पर भार नहीं बनती। पैसे, पद और प्रतिष्ठा का प्रभाव भी अब मन पर वैसा नहीं रहता। अपने लिए समय निकालना सीख लिया है और यह मान लिया है कि दुनिया मेरे बिना भी चलती रहेगी।
छोटे दुकानदारों से मोलभाव करना अब आवश्यक नहीं लगता। उनकी मुस्कान मेरी सबसे बड़ी कमाई बन जाती है। सड़क किनारे बेचने वाले लोगों से कभी-कभी बिना जरूरत की चीज़ भी खरीद लेती हूँ, क्योंकि मेरे पास विकल्प हैं, उनके पास नहीं।
बुज़ुर्गों और बच्चों की बातें अब धैर्य से सुन लेती हूँ। गलत लोगों से बहस करने के बजाय शांति को चुनती हूँ। जो अच्छा करता है, उसकी दिल से प्रशंसा करती हूँ, क्योंकि इससे आत्मा को सुकून मिलता है।
अब यह और स्पष्ट हो गया है कि व्यक्तित्व कपड़ों या ब्रांडेड चीज़ों से नहीं, बल्कि विचारों और संवेदनाओं से निखरता है। ऐसे लोगों से दूरी बना ली है जो अपनी जिद और संकीर्ण सोच मुझ पर थोपना चाहते हैं। यदि कोई जीवन की दौड़ में आगे निकलना चाहता है, तो मैं शांति से उसे मार्ग दे देती हूँ, क्योंकि न मैं किसी प्रतिस्पर्धा में हूँ और न ही मेरा कोई प्रतिद्वंद्वी है।
अब वही करती हूँ जिससे मन खुश रहता है। लोगों की राय का बोझ हल्का कर दिया है। पाँच सितारा चमक-दमक से अधिक प्रकृति की गोद सुकून देती है। अपने ऊपर खर्च करने से ज्यादा किसी ज़रूरतमंद की मदद करने में जो संतोष मिलता है, वही सच्चा सुख लगता है।
सही साबित करने के संघर्ष से बाहर आकर मौन को अपनाया है और खुद से प्रेम करना सीख लिया है। अब यह भी स्वीकार कर लिया है कि हम सब इस दुनिया के यात्री हैं। साथ केवल प्रेम, आदर और मानवता ही जाएगी।शरीर माता-पिता की देन है। आत्मा प्रकृति का वरदान है। जब अपना कुछ भी नहीं, तो लाभ-हानि की गणना क्यों? अपने सुख-दुख की जिम्मेदारी अब स्वयं स्वीकार कर ली है।
हर पल को जीना सीख लिया है, क्योंकि जीवन अनमोल भी है और अनिश्चित भी।मानव सेवा, जीव दया और प्रकृति के प्रति संवेदना में जो आंतरिक आनंद मिलता है, वही सच्चा आध्यात्मिक मार्ग लगता है।
अंततः हमें उसी प्रकृति और ईश्वर की गोद में समा जाना है।देर से ही सही… लेकिन अब सच में जीना आ गया है।
डॉ. सुनीता सक्सेना

