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बर्बादी का जश्न

तबाही मची, ज़िंदगी पलटी,

मैं फिर भी मुस्कुराता चला गया,

कुछ अपने छूटे, कुछ सपने टूटे,

मैं हर दर्द छुपाता चला गया।

अपनी बर्बादी का मातम करना शायद मुझे कभी आया ही नहीं,

ज़िंदगी मुझे मिटाती रही, और मैं उसका जश्न मनाता चला गया।

— सिद्धांत की कलम से

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