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पापा… वो अंतिम एहसास

पापा…

आज भी याद है मुझे आपकी उँगलियों का वह आख़िरी स्पर्श।

मन चाहता था समय को वहीं रोक दूँ,

आपका हाथ थामकर हर जाती हुई साँस को लौटा लाऊँ।

लेकिन कुछ पल हमारी चाहतों से बड़े होते हैं,

वे चुपचाप सब कुछ बदल जाते हैं।

उस दिन आपकी आँखें शांत थीं, और मेरी आँखों में पूरा समंदर उतर आया था।

मैं बार-बार मन ही मन कह रही थी—“पापा, अभी मत जाइए,मुझे अभी भी आपकी ज़रूरत है…

”जब मैंने आपके माथे को आख़िरी बार छुआ,

तो लगा जैसे मेरे जीवन की सबसे सुरक्षित छाँव धीरे-धीरे दूर हो रही हो।

समय बीत गया, लोग कहते हैं कि घाव भर जाते हैं,

पर कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो कभी याद नहीं बनते,

वे हमेशा धड़कनों में बसे रहते हैं।

आज भी कभी अकेली होती हूँ, तो लगता है

आपका हाथ मेरे सिर पर है।

आपका वह अंतिम स्पर्श मेरी स्मृतियों में नहीं,

मेरी आत्मा में बसा है, पापा…

कभी हौसला बनकर, कभी आँसू बनकर,

और कभी एक ऐसी कमी बनकर,

जिसे कोई कभी भर नहीं सकता।

— डॉ. सुनीता सक्सेना
निदेशक, बियॉन्डस्पॉटलाइट (BeyondSpotlight.in)

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