पहले पापा गए… तो लगा सिर से छाँव चली गई।फिर माँ चली गईं… तो लगा घर की आख़िरी गर्माहट भी साथ ले गईं।और जब जीवनसाथी ने भी साथ छोड़ दिया, तब समझ आया कि कुछ बिछड़नें इंसान को भीतर तक ख़ामोश कर देती हैं।समय ने यहीं नहीं रोका…
मेरे सास-ससुर, जो केवल रिश्ते नहीं, बल्कि अपनेपन की सच्ची मिसाल थे, वे भी एक दिन दूर चले गए।उनका स्नेह, उनकी चिंता, उनका आशीर्वाद, आज भी मेरी स्मृतियों में जीवित है।
आज भी कभी थक जाती हूँ, तो अनायास ही पापा की हिम्मत याद आती है, माँ की ममता याद आती है, जीवनसाथी का साथ याद आता है, और सास-ससुर का वह निस्वार्थ स्नेह, जिसने हर परिस्थिति में मुझे अपनी बेटी जैसा अपनापन दिया।
लोग कहते हैं समय सब सिखा देता है, पर समय जीना सिखा सकता है, कमी पूरी करना नहीं।मेरे जीवन के सबसे मज़बूत सहारे एक-एक करके दूर चले गए, पर उनकी यादें आज भी मेरे हर कदम के साथ चलती हैं।कभी पापा की सीख बनकर, कभी माँ की दुआ बनकर, कभी जीवनसाथी के प्रेम बनकर, और कभी सास-ससुर के आशीर्वाद बनकर।
मैं मुस्कुराती तो हूँ, पर दिल के किसी शांत कोने में आज भी कुछ नाम चुपचाप बसे हैं|पापा, माँ, मेरे जीवनसाथी, और मेरे सास-ससुर।यही मेरी ताकत हैं, यही मेरी सबसे बड़ी पूँजी हैं, और यही मेरे जीवन की सबसे गहरी कमी भी।
डॉ. सुनीता सक्सेना
निदेशक
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