न ऊँची इमारतों में कुछ तो अधूरा है,
हर खिड़की के पीछे कोई पुराना लम्हा ठहरा है।
रोशनी तो बहुत है, पर उजाला कहाँ है,
दिलों में जैसे कोई सन्नाटा पिघला पड़ा है।
हर मंज़िल एक नई चाह में बनी,
पर कहीं न कहीं रिश्ते पीछे रह गए।
घड़ियाँ चलती रहीं, लोग भागते रहे,
पर वक़्त जैसे ठहर-सा गया है।
कभी सोचता हूँ –
क्या सुकून वाक़ई पैसों से खरीदा जा सकता है?
या वो वहीं रह गया…
जहाँ मिट्टी की खुशबू थी,
जहाँ शामें धीमी और दिल सच्चे थे
अब ये इमारतें भी आपस में कहती हैं –
“तूने मुझे ऊँचा तो बना दिया,
पर मैं आज भी तन्हा खड़ा हूँ…”
-By Siddhant Saxena

