स्कूल जाते बच्चों के कंधों पर टँगा बस्ता हमें दिखाई देता है, पर उनके मन पर रखा बोझ अक्सर हमारी नज़रों से ओझल रह जाता है। हर बच्चा जो कक्षा में बैठा है, केवल एक विद्यार्थी नहीं है ,वह एक संवेदनशील मन भी है, जो अपने साथ एक अदृश्य बस्ता लेकर आया होता है। यह बस्ता किताबों से नहीं, बल्कि अनुभवों, परिस्थितियों और भावनाओं से भरा होता है।
आज के समय में बच्चों के जीवन में तनाव केवल बड़ों की दुनिया तक सीमित नहीं रह गया है। परीक्षा का दबाव, अपेक्षाओं का भार, तुलना, प्रतिस्पर्धा, पारिवारिक तनाव, आर्थिक असुरक्षा, अकेलापन, मोबाइल और सोशल मीडिया का प्रभाव – ये सब मिलकर बच्चे के मन को भीतर से थका देते हैं। कई बच्चों के लिए यह थकान स्कूल के दरवाज़े पर ही शुरू हो जाती है।
इस अदृश्य बस्ते में डर, चिंता, घबराहट, असुरक्षा, बीते हुए आघात, अधूरी शारीरिक आवश्यकताएँ, उपेक्षा का भाव, क्रोध, उदासी और निराशा शामिल होते हैं। जब यह बोझ बहुत बढ़ जाता है, तो सीखने की स्वाभाविक प्रक्रिया बाधित हो जाती है। बच्चा पढ़ाई में पिछड़ने लगता है, ध्यान भटकता है और व्यवहार में बदलाव दिखाई देने लगता है। दुर्भाग्य से, समाज अक्सर इन संकेतों को समझने के बजाय बच्चों पर लेबल लगा देता है – नालायक, आलसी, अनुशासनहीन या कमजोर। हम भूल जाते हैं कि व्यवहार, भीतर चल रहे संघर्ष का बाहरी रूप होता है। जो बच्चा बहुत चुप है, वह हमेशा शांत नहीं होता, और जो बच्चा बहुत शोर करता है, वह हमेशा बिगड़ा हुआ नहीं होता। कई बार शोर भी मन की पीड़ा का स्वर होता है।
सीखना केवल किताबें पढ़ लेने या प्रश्नों के उत्तर लिख देने का नाम नहीं है। सीखना तभी संभव है जब बच्चा मानसिक रूप से सुरक्षित और भावनात्मक रूप से समर्थ महसूस करे। भय और असुरक्षा के माहौल में दिया गया ज्ञान बच्चे के मन में टिक नहीं पाता। इसके विपरीत, स्नेह और विश्वास के वातावरण में बच्चा सहज रूप से सीखता है, प्रश्न करता है और आगे बढ़ता है।शिक्षक यहाँ एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
एक संवेदनशील शिक्षक बच्चे की कॉपी से पहले उसके चेहरे को पढ़ता है। वह अंक से पहले मन को समझने का प्रयास करता है। छोटी-सी सराहना, धैर्यपूर्वक सुनी गई बात, बिना तुलना किया गया मार्गदर्शन – ये सब मिलकर बच्चे के आत्मविश्वास की नींव रखते हैं।
अभिभावकों की भूमिका भी कम नहीं है। अक्सर अनजाने में हम बच्चों पर अपनी अधूरी इच्छाओं का बोझ डाल देते हैं। अच्छे अंक, बेहतर प्रदर्शन और “सबसे आगे” रहने की चाह में हम यह भूल जाते हैं कि बच्चा पहले इंसान है, प्रतियोगी नहीं। जब घर सुरक्षित और स्नेहपूर्ण होता है, तो बच्चा बाहर की चुनौतियों का सामना बेहतर ढंग से कर पाता है।
समाज को भी यह समझने की आवश्यकता है कि बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उनका शारीरिक स्वास्थ्य। जैसे हम बुखार या चोट को गंभीरता से लेते हैं, वैसे ही डर, चिंता और उदासी को भी समझने और स्वीकारने की ज़रूरत है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम बच्चों को केवल अनुशासन और परिणामों के दायरे में न बाँधें। हमें उन्हें सुनने, समझने और अपनाने का समय देना होगा। कभी-कभी एक सच्चा संवाद, एक भरोसे भरा स्पर्श या बस यह आश्वासन कि “तुम अकेले नहीं हो”- बच्चे के अदृश्य बस्ते को हल्का कर देता है।जब बच्चा यह महसूस करता है कि उसे देखा जा रहा है, समझा जा रहा है और स्वीकार किया जा रहा है, तब उसका मन खुलता है। तब सीखना बोझ नहीं, आनंद बन जाता है।इसलिए, सीखने से पहले ज़रूरी है समझना।पढ़ाने से पहले ज़रूरी है अपनाना।और अनुशासन से पहले ज़रूरी है प्रेम।क्योंकि जब बच्चों का दिल हल्का होता है, तभी उनका भविष्य उजला होता है।
— डॉ. सुनीता सक्सेना निदेशक, बियॉन्ड स्पॉटलाइट

