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दीवारों के बीच सिमटता मन

कभी-कभी मन यह प्रश्न करता है

क्या सचमुच हम बड़े घरों में रह रहे हैं,या बड़े घर हमारे भीतर के

खालीपन को ढँक रहे हैं?

हम स्थान बढ़ाते जा रहे हैं —

ड्रॉइंग रूम विस्तृत,

शयनकक्ष सुसज्जित,

बालकनी सजी हुई..

पर क्या उतनी ही सजावट हमारे व्यवहार में भी है?

दीवारें ऊँची होती जा रही हैं,

पर संवाद की आवाज़ धीमी पड़ रही है।

कमरे बढ़ रहे हैं,

पर साथ बैठने का समय घट रहा है।

शायद समस्या मकान के आकार में नहीं,

मन के आकार में है।

जहाँ “मैं” का विस्तार होता है,

वहाँ “हम” सिमटने लगता है।

घर तब घर बनता है

जब उसमें रहने वाले लोग

एक-दूसरे को स्थान देते हैं —

सुनने का स्थान,

समझने का स्थान,

और स्वीकार करने का स्थान।

जहाँ अहंकार दीवार बन जाए,

वहाँ प्रेम की खिड़कियाँ बंद हो जाती हैं..

और जहाँ विनम्रता दरवाज़ा खोल दे,

वहीं संबंध साँस लेते हैं।

अंततः घर का माप वर्गफुट में नहीं,

रिश्तों की ऊष्मा में होता है।

एक क्षण ठहरकर सोचें…

क्या हमारे घर में स्थान अधिक है

या अपनापन?

क्या हमारे शब्दों में अधिकार अधिक है

या आदर?

क्या हमारे जीवन में “मैं” अधिक है

या “हम”?

शायद उत्तर ही हमें घर का वास्तविक आकार बता देगा।

डॉ. सुनीता सक्सेना

निदेशक,

BeyondSpotlight.in

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